सोहन सिंह भकना जिन्होंने बनाई थी ग़दर पार्टी

सोहन सिंह भकना जिन्होंने बनाई थी ग़दर पार्टी

आज मैं आपको भारत की आजादी के आंदोलन में अपना सब कुछ न्योछावर कर देने वाले पंजाब के एक और शेर सोहन सिंह भकना के बारे में बताने जा रहा हूँ | लेकिन सोहन सिंह भकना के बारे में जानने से पहले आपको थोड़ा फादर स्टेन स्वामी के बारे में बताना चाहता हूँ | फादर स्टेन स्वामी 83 साल के बुजुर्ग थे जो झारखंड में आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ते रहते थे | उन्हें एन आई ए ने भीमा कोरेगांव केस में गिरफ्तार किया था |

स्टेन स्वामी पार्किंसन की बीमारी से पीड़ित थे जिस कारण जेल में उन्हें पानी और कोई भी तरल पदार्थ पीने के लिए सिप्पर और स्ट्रॉ की ज़रूरत पड़ती थी |जब स्टेन स्वामी को गिरफ्तार करके जेल में रखा गया तो उन्हें सिर्फ सिप्पर और स्ट्रॉ के लिए स्टेन स्वामी को अदालत के सामने अर्जी लगानी पड़ी | आपको जानकार हैरानी होगी की इतनी छोटी सी ज़रूरत के लिए प्रॉसिक्यूशन ने जवाब दायर करने का समय मांगा | इसके बाद माननीय जज ने प्रॉसिक्यूशन को 20 दिन का समय भी दे दिया |इतनी साधारण सी ज़रूरत के लिए स्टेन स्वामी को कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा |

Sohan Singh Bhakna in Hindi

खैर अदालत ने सीपर मुहैया करवाने का आदेश दे दिया | इस मामले में सबसे दुखद बात ये रही की स्टेन स्वामी जमानत के लिए लड़ते रहे लेकिन उन्हें जमानत नहीं मिली | और आख़िरकार स्टेन स्वामी इस दुनिया को अलविदा कह गये |

आप सोच रहे होंगे की ये कहानी बताने का यहां पर क्या औचित्य बनता है |तो आपको बता दें कि इससे कहीं ज़्यादा बुरा सलूक अंग्रेजों के द्वारा हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के साथ किया जाता था | पर आज़ाद देश में, कोरोना के समय में और 2021 के विश्व गुरु भारत में ये सब होना थोड़ा अजीब लगता है |

16 साल जेल में अंग्रेजों के जुल्मों को सहा

बात करें ब्रिटिश काल की तो उस वक़्त भी ऐसे ही कानूनी नियमों की आड़ लेकर किसी भी विरोध की आवाज को दबाया जाता था | और सोहन सिंह भकना ने एक लंबा समय जेल में बिताया था | जहां उनके और दूसरे भारतीय कैदियों के साथ बहुत अमानवीय व्यवहार किया जाता रहा है | उन्हें इस तरह के काम दिए जाते थे जिन्हें पूरा करना किसी भी इंसान के लिए संभव ही नहीं था |

और काम पूरा नहीं होने की स्थिति में उन्हें तरह तरह की यातनाएं दी जाती थी | एक तो उन्हें जेल में अच्छा खाना नहीं दिया जाता था और बहुत बार उनके राशन में कटौती भी कर दी जाती थी | उन्हें भूखा रखकर भूख से मरने के लिए छोड़ दिया जाता था | इस अमानवीय व्यवहार से परेशान होकर बहुत से कैदी अपना मानसिक संतुलन खो देते थे तो बहुत से अपना जीवन |

पर अंग्रेजी हुकूमत के इतने ज़ुल्म सहने के बाद भी सोहन सिंह भकना ने हार नहीं मानी | और वो हमेशा ही जेल में रहने के दौरान इसके खिलाफ आवाज़ उठाते रहे | भगत सिंह और उनके साथियों की वो भूख हड़ताल तो आपको याद ही होगी जिसने अँग्रेज़ी सरकार को हिला कर रख दिया था |अगर नहीं तो भगत सिंह के बारे में ये वीडियो आपको ज़रूर देखना चाहिए |

भगत सिंह ने जो भूख हड़ताल की थी कुछ उसी तरह की भूख हड़ताल सोहन सिंह भकना और दूसरे गदर पार्टी के नेता भी कर चुके थे | उनकी इस भूख हड़ताल से परेशान होकर ब्रिटिश गवर्नमेंट को उनकी अच्छे खाने और दूसरी जरूरी सुविधाएं देने की मांग को मानना पड़ा था | सोहन सिंह और उनके साथियों को अलग अलग जेलों में भेजा जाता रहा और हर जगह उन्हें नयी परेशानियों से दो चार होना पड़ा |

वो ना जाने किस मिट्टी के बने थे, उम्र के उस पड़ाव पर भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी | जब 1929 में भगत सिंह और उनके साथियों ने भूख हड़ताल की तो उनकी उम्र ज्यादा हो चुकी थी | फिर भी वो इस भूख हड़ताल का हिस्सा बनाना चाहते थे | भगत सिंह और उनके साथियों ने बाबा सोहन सिंह जी से आग्रह किया की वो इस भूख हड़ताल में हिस्सा न लें क्यूंकि एक तो उनकी उम्र बहुत ज्यादा थी |

दूसरा वो पहले ही ब्रिटिश सरकार के जुल्मों को बहुत ज्यादा बर्दाश्त कर चुके थे | एक और भूख हड़ताल उनके जिंदगी के लिए खतरा बन सकती थी | पर सोहन सिंह भकना भले ही बूढ़े हो चुके थे लेकिन उनमें अभी भी वही जोश बरकरार था |जब भगत सिंह और उनके साथियों ने सोहन सिंह को भूख हड़ताल में शामिल होने के लिए मना किया तो सोहन सिंह ने जवाब दिया

“क्या हुआ अगर मेरा शरीर बूढ़ा हो गया है, मेरे अंदर का क्रांतिकारी अभी भी जवान है” सोहन सिंह भकना ने अपनी जिंदगी के 16 साल जेल में गुजार दिए, और 1930 में उन्हें जेल से आजादी मिली |

समृद्ध सिख परिवार में हुआ सोहन सिंह भकना का जन्म

सोहन सिंह भकना ने आज़ादी के लिए क्रांतिकारियों को संगठित करने का किया था काम

सोहन सिंह भकना का जन्म एक समृद्ध सिख परिवार में जनवरी 1870 को पंजाब के अमृतसर जिले के खुतराई खुर्द गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम करम सिंह और माता का नाम राम कौर था | उनके पिता बहुत ही दयालु इंसान थे | अच्छी ज़मीन होने के बावजूद उन्होंने ज्यादा धन इकठ्ठा नहीं किया था | बल्कि वो अपनी फसलों का बड़ा हिस्सा आस पास के ग़रीब लोगों में बाँट दिया करते थे |

इसके बारे में सोहन सिंह ने अपनी किताब जीवन संग्राम में भी लिखा है, वो कहते हैं कि “अच्छी ज़मीन होने के बावजूद मेरे पिता ने ज्यादा धन इकट्ठा नहीं किया, क्योंकि वो एक सच्चे सिख थे जिन्होने अच्छे कामों पर ज्यादातर धन खर्च किया”

सोहन सिंह जब एक वर्ष के हुए थे तो उनके पिता की मृत्यु हो गई थी | उनकी शुरुआती पढ़ाई अपने गाँव भकना में घर के पास एक गुरुद्वारे में ही हुई थी | लेकिन उनकी माता जी उन्हें अच्छी शिक्षा दिलवाना चाहती थी | पर उस इलाके में उस समय कोई अच्छा स्कूल नहीं था | बहुत छोटी सी उमर में उनकी शादी बिशन कौर से हो गई, उस वक्त उनकी उम्र 10 साल की रही होगी | 5 वीं तक की पढ़ाई एक उर्दू स्कूल के करने के बाद 1907 में वो अमेरिका चले गये |

अमेरिका में बनाई गदर पार्टी

अमेरिका में सोहन सिंह भकना के साथ दूसरे भारतीयों की तरह से अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता था | उन्हें अमेरिका में वो सम्मान नहीं मिलता था जो अमेरिका में पहुँचने वाले आज़ाद देश के लोगों को मिलता था | सोहन सिंह जी समझ गये थे की अगर उन्हें अपने लिए सम्मान हासिल करना है तो पहले उन्हें अपने देश को अंग्रेजों से आजाद करवाना होगा |

और यहीं से जन्म होता है उस क्रांति का जो आगे चलकर बहुत से क्रांतिकारियों को देश की आजादी के लिए लड़ने की प्रेरणा देती है | करतार सिंह साराभा जैसे क्रांतिकारी भी इसी क्रांति से निकले थे जिन्हें भगत सिंह भी अपना गुरु मानते थे | अमेरिका में सोहन सिंह भकना, लाला हरदयाल और कांशीराम ने मिलकर पेसिफिक कोस्ट हिन्दी असोसिएशन नाम का एक संगठन बनाया |

इस एसोसिएशन को बनाने के पीछे लाला हरदयाल की सोच थी | बाद में इसका नाम बदलकर गदर पार्टी रख दिया गया | सोहन सिंह को इसका अध्यक्ष और कांशीराम को इसका महासचिव बनाया गया | पार्टी का मुख्यालय सैन फ्रांसिस्को में था और इसके ज्यादातर सदस्य पंजाब के पूर्व सैनिक और किसान थे | इसमें ज्यादातर वो लोग थे जो कभी अच्छी जिंदगी और पैसा कमाने की चाहत में अमेरिका आ गये थे |

लाला हरदयाल को इंग्लैंड की ऑक्स्फर्ड यूनिवर्सिटी से भारत की आजादी से जुड़ी गतिविधियां चलाने के आरोप में निकाल दिया गया था | इसके बाद वो अमेरिका पहुँचे थे और वहाँ गदर पार्टी की स्थापना की थी | पंडित कांशीराम का जन्म मोरिन्डा के पास मड़ौली कलां नाम के गाँव में हुआ था | उन्होंने अपनी पढ़ाई पटियाला के मोहिंद्रा हाई स्कूल जो अब मोहिंद्रा कॉलेज है से पूरी की और बाद में अमेरिका चले गये थे |

गदर पार्टी गदर और गदर दी गूँज नाम से अख़बार और पम्फ्लेट्स निकाला करती थी जिसे पूरी दुनिया में बसे भारतीयों तक भेजा जाता था | जिसका एक ही मकसद था अंग्रेजों से भारत को आजाद करवाना और भारत और विदेशों में रह रहे भारतीयों में देशभक्ति की भावना को प्रज्वलित करना |

पकड़े जाने पर मिलती थी फांसी की सजा

धीरे धीरे गदर पार्टी के लोग अपना काम कर रहे थे और बहुत से भारतीयों जो विदेशों में अच्छा जीवन जी रहे थे भारत की भूमि का कर्ज उतारने के लिए अपना सब कुछ छोड़ कर भारत आने के लिए तैयार हो गये थे | भारत में क्रांति के लिए एक दिन भी निश्चित कर लिया गया था लेकिन किसी तरह से ब्रिटिशर्स को इस इसका पता चल गया |

जैसे ही क्रांतिकारियों का वो जत्था समुद्री जहाज के ज़रिए भारत पहुँचा, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया | सोहन सिंह भकना, करतार सिंह साराभा, विष्णु गणेश पिंगले जैसे बहुत से क्रांतिकारियों को भी गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें फांसी की सजा सुना दी गयी | कुल 23 गदर क्रांतिकारियों को फांसी की सजा सुनाई गई थी लेकिन मोती लाल नेहरू किसी तरह फांसी से एन पहले 16 क्रांतिकारियों को बचाने में सफल हो गये थे |

जबकि करतार सिंह साराभा, विष्णु गणेश के साथ कुल 7 क्रांतिकारियों को फांसी दे दी गयी थी | सोहन सिंह को पूरी जिंदगी इस बात का अफ़सोस रहा की उनकी फांसी क्यों रुक गई | जिन जवाहरलाल नेहरू के बारे में ना जाने कितनी झूठी बातें रोजाना सोशियल मीडीया पर शेयर की जाती हैं उनके पिता की सूझबूझ की वजह से कुछ गदर नेताओं की फांसी रुक गई थी |

जिसके पीछे मोती लाल नेहरू ने अदालत में जो तर्क दिया था वो ये था की जब उन्हें गिरफ्तार किया गया तो वो पोर्ट पर थे और भारत की जमीन पर पैर भी नहीं रखा था | इसके बाद सोहन सिंह को उम्र कैद की सजा सुनाई गयी और उन्हें सालों तक जेल में रहना पड़ा | 16 साल जेल में गुजारने के बाद 1930 में उन्हें जेल से रिहा किया गया |

जेल से रिहा होने के बाद सोहन सिंह किसानों के लिए काम करते रहे | 1943 में सोहन सिंह ने अपने भकना कलां में एक किसान सभा का आयोजन किया था | जिसके बाद बहुत से नेताओं को गिरफ्तार किया गया | इस तरह सोहन सिंह हमेशा से देश और किसानों के हक़ों के लिए लड़ते रहे | वो कम्युनिस्ट पार्टी के लिए भी लंबे समय तक काम करते रहे | जेल से रिहा होने के बाद सोहन सिंह भकना किसानों और कम्युनिस्ट पार्टी के लिए भी लंबे समय तक काम करते रहे | नोट – प्रत्येक फोटो प्रतीकात्मक है (फोटो स्रोत: गूगल) [ डि‍सक्‍लेमर: यह न्‍यूज वेबसाइट से म‍िली जानकार‍ियों के आधार पर बनाई गई है. EkBharat News अपनी तरफ से इसकी पुष्‍ट‍ि नहीं करता है. ]

Rutvisha patel

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