रूस के अरबपति क्यों गायब हो रहे है? oil industry का killer कैसे बना putin l देखिए video

रूस के अरबपति क्यों गायब हो रहे है? oil industry का killer कैसे बना putin l देखिए video

यूक्रेन से जूझ रहे रूस (Ukraine Russia War) की कमर आर्थिक रूप से तोड़ने की गरज से लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंधों की धज्जियां, अमेरिका के दोस्त और दुश्मन सब मिलकर उड़ाने में जुटे हैं. फिर चाहे वो चीन हो या फिर यूरोपियन यूनियन (European Union) के देश. ऐसा करने वालों में अमेरिका के दुश्मन नंबर वन चीन को अगर छोड़ भी दिया जाए, तो बाकी सभी दोस्त अमेरिका की मित्र-मंडली में शामिल हैं. जो रूस पर लागू अमेरिकी प्रतिबंधों (Sanctions on Russia) का खुलेआम मखौल उड़ाने में नहीं शरमा रहे हैं. भले ही क्यों न अमेरिकी प्रतिबंधों (American Sanctions on Russia) के बाद से पूरी दुनिया में तेल (Russia Oil Business) के दामों को लेकर हाहाकार मचा हुआ हो. विकासशील देशों में तो तेल की बढ़ती कीमतों का सीधा असर अर्थव्यवस्था पर ही पड़ता हुआ दिखाई देने लगा है. यह हवा में यूं ही नहीं है बल्कि इन तथ्यों को साबित करती एक रिपोर्ट भी हाल में ही सामने आई है.

यूरोप समेत पश्चिमी देश लगातार हम (भारत) पर व एशियाई देशों पर रूस से तेल खरीद कम करने का दबाव बनाने में जुटे हुए हैं. हम और एशियाई देश हैं कि इन सबकी कुछ भी सुनने को राजी ही नहीं हैं. हालांकि ऐसा करने से रोकने वाले इन देशों की दलील है कि, रूस को इस वक्त किसी भी तरह का भुगतान उसे यूक्रेन के खिलाफ युद्ध में मदद करने जैसा है. जबकि भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर पहले ही दो टूक दुनिया को बता चुके हैं कि जितना तेल भारत रूस से कई-कई महीनों में खरीद पाता है, उतना तेल-गैस तो यूरोप के देश चंद दिन में खरीद लेते हैं. फिर अमेरिका द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों को मानने पर भला भारत या फिर एशियाई देश ही बाध्य क्यों हों? यूरोप के वे देश क्यों नहीं इन प्रतिबंधों को मानेंगे जो खुद भारत से कहीं ज्यादा तेल-गैस रोजाना रूस से आज भी खरीद रहे हैं. अगर वे चाहते हैं कि भारत और एशियाई देश रूस से ईंधन आयात न करें. तो पहले यह काम खुद आपत्ति उठाने वाले देशों को भी तो करना होगा.

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खुद तेल खरीद रहे मगर भारत न खरीदे

ऐसा कैसे संभव है कि प्रतिबंधों की धज्जियां उड़ाकर पश्चिम देश रूस से ईंधन पानी खरीदते रहें और भारत-एशियाई देश या चीन ऐसा करना रोक दे? आइए अब नजर डालते हैं उस रिपोर्ट पर जो हाल ही में उजागर हुई है. दो स्वतंत्र संस्थानों फिनलैंड के सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एनर्जी (CREA) तथा कमोडिटी डेटा फर्म केप्लर ने, दुनिया भर में रूस के ईंधन की बिक्री को लेकर अहम आंकड़ों से संबंधित जानकारियां बांटी हैं. जिनमें रूस से निकलने वाले कच्चे तेल से लेकर प्राकृतिक गैस और कोयले तक के निर्यात का डेटा का हवाला दिया गया है. ऐसे में अब जानना जरूरी है कि आखिर पश्चिमी देशों के दावों के बीच, रूस ईंधन आयात के जरिए कितनी कमाई कर रहा है? साथ ही कौन से देश मौजूदा वक्त में रूस से सबसे ज्यादा तेल- ईंधन खरीद रहे हैं?

रिपोर्ट में हुआ है बड़ा खुलासा

सार्वजनिक हो चुकी रिपोर्ट्स के मुताबिक, रूस ने यूक्रेन से युद्ध छिड़ने के बाद 100 दिन में 93 अरब यूरो की कमाई की थी. रूस की इस कमाई में एक बड़ा हिस्सा सिर्फ और सिर्फ यूरोपीय देशों का ही मौजूद मिला है. तब, जब यूरोपीय संघ (EU) निरंतर रूस पर खुद की निर्भरता घटाने की दावेदारी पेश करता रहा है. युद्ध शुरू होने के बाद के 100 दिन में रूस की ओर से किए गए कुल ईंधन निर्यात में के अनुपात में से 61 फीसदी हिस्सा यूरोपीय संघ ने हासिल किया जिसकी अनुमानित कीमत 57 अरब यूरो रही. CREA की रिपोर्ट में युद्ध शुरू होने के बाद, 100 दिन में तेल आयात के जो आंकड़े दिए गए हैं, उनसे भी साफ हो जाता है कि जंग के दौरान चीन ने रूस से सबसे ज्यादा तेल आयात किया है. यह बात भला अमेरिका को कहां चैन से सोने देने वाली हो सकती है कि चीन सा अमेरिका का कट्टर दुश्मन खुलकर इस तरह से रूस की मदद करने पर आमादा है. मतलब अकेले चीन ने ही रूस से 13.97 अरब यूरो का ईंधन आयात करके अमेरिका की नींद उड़ा दी है.

रूसी तेल का चीन सबसे बड़ा आयातक बना

मतलब साफ है कि रूस के कुल निर्यात में एक अनुमान और जारी रिपोर्ट्स के मुताबिक, 13-14 फीसदी चीन ने हासिल किया है जोकि बड़ा अनुपात कहा जा सकता है. इसके बाद यूरोप में सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ता देश जर्मनी का नाम जारी रिपोर्ट्स में निकल कर सामने आता है. जर्मनी ने भले ही क्यों न देखने-दिखाने को रूस से दूरी बनाने के बड़े-बड़े दावे ठोंके हों लेकिन, उसका आयात इन 100 दिनों में 12.96 अरब यूरो का रहा है. रूस से ईंधन आयात करने वाले देशों की तालिका में तीसरे नंबर पर नीदरलैंड्स (9.37 अरब यूरो), चौथे पर इटली (8.4 अरब यूरो), पांचवें पर तुर्की (7.4 अरब यूरो), छठे पर फ्रांस (4.7 अरब यूरो) और सातवें पायदान पर पोलैंड (4.5 अरब यूरो) का नाम दर्ज है. मतलब रूस के टॉप सात तेल खरीददार देशों में से पांच तो सिर्फ यूरोपीय संघ के ही देश हैं. ऐसे में सवाल पैदा होता है कि फिर आखिर भारत या एशियाई देश ही क्यों अमेरिका के प्रतिबंधों को मानने के लिए बाध्य हैं?

भारत भी रूस के साथ कंधा मिलाकर खड़ा है

जग-जाहिर है कि भारत ने रूस-यूक्रेन की खूनी भिड़ंत शुरू होने के तुरंत बाद से ही रूस के साथ ईंधन की खरीद बढ़ा दी थी. जोकि अब तक बदस्तूर जारी है. हालांकि, भारत मुख्य तौर पर रूस से तेल की ही खरीद पहले से भी करता आ रहा है. जहां युद्ध शुरू होने से ठीक पहले फरवरी 2022 तक, भारत रूस से प्रतिदिन एक लाख बैरल कच्चा तेल आयात कर रहा था. वहीं अप्रैल 2022 में यह आयात 3 लाख 70 हजार बैरल प्रतिदिन और मई महीने में उससे भी कहीं ज्यादा बढ़कर, 8 लाख 70 हजार बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गई. तो भला इसमें बुराई ही क्या है. इस सबके बाद भी तो भारत ने उतना ईंधन रूस से नहीं खरीद डाला जितना कि यूरोपियन संघ के देश रोजाना ही खरीद रहे हैं. प्रतिबंध सिर्फ भारत के लिए ही क्यों? प्रतिबंधों की बंदिश से तो यूरोपियन संघ के देश भी बंधे हुए हैं. सीआरईए की रिपोर्ट के ही मुताबिक, भारत इस वक्त रूस के कच्चे तेल के बड़े आयातकों में से दुनिया में प्रमुख है. नोट – प्रत्येक फोटो प्रतीकात्मक है (फोटो स्रोत: गूगल) [ डि‍सक्‍लेमर: यह न्‍यूज वेबसाइट से म‍िली जानकार‍ियों के आधार पर बनाई गई है. EkBharat News अपनी तरफ से इसकी पुष्‍ट‍ि नहीं करता है. ]

Rutvisha patel

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