कैसे पड़ी थी टाटा कंपनी की नींव?किस तरह साकार हुआ सपना |

कैसे पड़ी थी टाटा कंपनी की नींव?किस तरह साकार हुआ सपना |

वीरेंद्र ओझा, जमशेदपुर। औद्योगिक भारत की नींव जमशेदपुर से ही पड़ी थी, लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि इसके प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद रहे। इसे संयोग ही कहा जाएगा कि जेएन टाटा (जमशेदजी नसरवानजी टाटा) और विवेकानंद की मुलाकात ऐसे समय में हुई, जब दोनों एक इतिहास रचने अमेरिका जा रहे थे। जेएन टाटा भारत में इस्पात संयंत्र की स्थापना के उद्देश्य से जा रहे थे, जबकि विवेकानंद को शिकांगो की संसद में आध्यात्मिक प्रवचन देना था।

बात सितंबर 1893 की बात है। वे एक ही जहाज पर आमने-सामने बैठे थे, लेकिन एक-दूसरे को नहीं जानते थे। बातचीत के क्रम में स्वामी जी की बातों और विचारों से जमशेदजी टाटा बहुत प्रभावित हुए। जब जेएन टाटा ने स्वामी विवेकानंद को बताया कि वे भारत में इस्पात संयंत्र स्थापित करना चाहते हैं, तो उन्होंने मयूरभंज राज में कार्यरत भूगर्भशास्त्री पीएन (प्रमथनाथ) बोस से मिलने की सलाह दी। यह भी बताया कि उसी क्षेत्र के आसपास लौह अयस्क, कोयला समेत अन्य खनिज का प्रचुर भंडार भी है। वहां से लौटने के बाद जेएन टाटा ने अपने बड़े पुत्र दोराबजी टाटा को मयूरभंज (ओडिशा) भेजा, जहां उन्होंने पीएन बोस से मुलाकात की। बोस ने उन्हें बताया कि गोरुमहिषाणी (ओडिशा) में लौह अयस्क का प्रचुर भंडार है, तो अन्य खनिज भी आसपास ही हैं।

इसके बाद स्थल की खोज शुरू हुई, जिसमें अमेरिका के सर्वेक्षण विशेषज्ञ चा‌र्ल्स पेज पेरिन भी शामिल थे। पेरिन के बारे में अमेरिका के विश्व प्रसिद्ध धातु विशेषज्ञ जूलियन केनेडी ने जेएन टाटा को बताया था। बाद में सीएम वेल्ड भी मिल गए। अपनी मृत्यु से पूर्व जेएन टाटा ने अपने पुत्र दोराबजी टाटा को इस्पात उद्योग की परिकल्पना को साकार करने के लिए सन 1904 में जर्मनी से एक पत्र लिखा। इस पत्र में था- ‘पुत्र, स्वदेशी धन, स्वदेशी कच्चा सामान, स्वदेशी दिमाग के सहयोग से एक ऐसे इस्पात उद्योग की परिकल्पना को साकार करो, जिससे संपूर्ण राष्ट्र में सशक्त औद्योगिक क्रांति का सूत्रपात हो।’ जमशेदजी की परिकल्पना को साकार रूप देने के लिए पुत्र दोराबजी टाटा भूंगर्भ शास्त्रियों पीएन बोस, सीएम वेल्ड के साथ-साथ निकल पड़े। उनके परम मित्र श्रीनिवास राव भी रहे।

ऐसे सपना हुआ साकार

ओडिशा, मध्य प्रदेश, बिहार के लौह-कोयले के खनिज बहुमूल्य क्षेत्रों में भूलते-भटकते 1907 ई के दिसंबर में एक स्थान का चुनाव किया। वही, स्थान जमशेदपुर है। यहीं दो नदियों स्वर्णरेखा और खरकई के संगम पर एक स्थान पर छोटा सा कैंप डाला गया। चारों ओर घोर जंगल था। वहां से कुछ मील की दूरी पर एक रेलवे स्टेशन था कालीमाटी। स्टेशन जाने-आने के लिए पगडंडियों का सहारा था। रात के अंधेरे में जंगली जानवरों की आवाज के साथ-साथ शेर की दहाड़ सुनाई देती थी। भिश्ती ढोकर पानी लाते थे। जंगल में रहने वाले आदिवासियों ने जी तोड़कर परिश्रम किया। सुबह से शाम तक काम चला। जंगल साफ किए गए, झोपडि़यां बनाई गई, जो सात-आठ फीट लंबी चौड़ी थी। जमशेदजी की मृत्यु 1904 को जर्मनी में हुई।

खूबसूरत नगर भी बसाया

जेएन टाटा के मन में एक इस्पात कारखाना के साथ ही एक ऐसा शहर बसाने की कल्पना भी थी, जहां सारी सुविधाएं उपलब्ध हों। अपने पुत्र दोराबजी को अपनी मृत्यु के पूर्व पत्र लिखा था- पुत्र, इस्पात नगर ऐसा हो जहां पार्क हो, सड़क के दोनों ओर हरे-भरे लहराते पेड़ पौधे हों, शिक्षा की उचित व्यवस्था हो, खेलकूद के लिये लम्बे-चौड़े मैदान हों, सभी जातियों, हिंदू, मुसलमान, ईसाई सहित सभी धर्मावलंबियों के लिए प्रार्थना स्थल हों, रहने के लिए सुविधा संपन्न घर हों, ताकि यहां कार्य करने वाले सभी जन इस कारखाने और शहर को अपना मानें-जानें। इन्हीं भावनाओं से भरा पत्र दोराबजी को स्वदेशी भावना, स्वदेशी धन, स्वदेशी कच्चे सामान के सहयोग वाला कर्तव्य पथ दिखा रहा था।

लगन, निष्ठा, परिश्रम से कार्य होता रहा और आखिर वह पुनीत दिन 27 अगस्त, 1907 को आया जब इस्पात कारखाने का रजिस्ट्रेशन हुआ। दो करोड़ की लागत से कार्य को मूर्त रुप दिया गया। अब निर्माण कार्य तेजी चल पड़ा। 1908 में नगर का पहला मकान साकची में बना। पहले कुछ वर्षो में उद्योग का उत्पादन मंद गति से चला। स्वदेशी पूंजी थी, स्वदेशी सामान था, काम रहा था पर उच्च पदों पर विदेशी ही कार्यरत थे। इनकी कार्य कुशलता जो भी रही हो पर उनकी मानसिकता अवश्य ही विदेशी थी। फलत: उत्पादन में उतार-चढ़ाव आते रहे। इसी बीच 2 जनवरी 1919 में भारत के गवर्नर लार्ड चेम्सफोर्ड टाटानगर पधारे। कारखाना व नगर को देखा। उन्होंने ही शहर का नामकरण कारखाने के संस्थापक जमशेदजी नसरवान जी टाटा के नाम पर जमशेदपुर रखा और कालीमाटी स्टेशन का नाम दिया टाटानगर स्टेशन।

वर्ष 1940 से कंपनी का होने लगा विस्तार टाटा स्टील ने 1940 से कंपनी का विस्तार शुरू किया, जिसमें सबसे पहले टाटा मोटर्स (तब टेल्को या टाटा लोकोमोटिव एंड इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड) खोली गई। इसके बाद 1951 से 1988 ई. तक उद्योग व शहर का विस्तार तेजी से हुआ। नोट – प्रत्येक फोटो प्रतीकात्मक है (फोटो स्रोत: गूगल) [ डि‍सक्‍लेमर: यह न्‍यूज वेबसाइट से म‍िली जानकार‍ियों के आधार पर बनाई गई है. EkBharat News अपनी तरफ से इसकी पुष्‍ट‍ि नहीं करता है. ]

Rutvisha patel

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