कैसे भारत के लोग बन रहे है internet scams का शिकार? | देखिए video

कैसे भारत के लोग बन रहे है internet scams का शिकार? | देखिए video

डिजिटल ट्रांजैक्शन आने साथ-साथ ऑनलाइन फ्रॉड के मामलों में भी बढ़ोतरी हो गई है. भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार मार्च 2019 की तुलना में मार्च 2022 में डिजिटल पेमेंट में 10 प्रतिशत से 210 फीसदी तक की वृद्धि हुई है. इसके अलावा यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस ( UPI), इमेडिएट पेमेंट सर्विस (IMPS) और प्रीपैड पेमेंट इन्स्ट्रूमेंट (PPI) ट्रांजैक्शन में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है. लोग व्यापक रूप से इस बात को स्वीकार करते हैं कि भारत में दैनिक भुगतान करने के लिए UPI सबसे आम तरीका है, लेकिन कुछ लोगों के लिए यह अभी भी एक विदेशी अवधारणा है.

आंकड़ों के मुताबिक भारत में लोग बड़ी संख्या में डिजिटल लेन-देन कर रहे हैं. इसके बावजूद सिक्योरिटी इशूज में कोई कमी नहीं आई है. शिक्षा की कमी और ऑनलाइन पेमेंट के बारे में जानकारी कम होने के कारण अधिकांश लोग ऑनलाइन धोखाधड़ी का शिकार हो जाते हैं. आज हम आपको पांच ऐसी ऑनलाइन धोखाधड़ी के बारे में बताने जा रहे हैं लोग जिसका सबसे ज्यादा शिकार होते हैं. हालांकि, थोड़ी सावधानी से इससे आसानी से बचा जा सकता है.

रिमोट एक्सेस / स्क्रीन शेयरिंग फ्रॉड

समय-समय पर हमने बुजुर्गों को ऑनलाइन बैंकिंग के दौरान धोखाधड़ी का शिकार होते देखा है. स्कैमर्स आमतौर पर खुद को बैंक कर्मचारियों के रूप में पेश आते हैं, जो एक निश्चित सेवा को एनेबल करना चाहते हैं या आपके फोन पर किसी परेशानी को हल करना चाहते हैं. यदि वे समस्या का समाधान नहीं करते हैं तो वे आपको आपके बैंक अकाउंट के परिणामों और उनके खतरों के बारे में चेतावनी देंगे.

लोग अक्सर जल्दबाजी में धोखेबाज द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन करते हैं और रिमोट एक्सेस / स्क्रीन शेयरिंग ऐप इंस्टॉल कर लेते हैंय जैसे ही आप उन्हें एक्सेस देते हैं, स्कैमर्स संवेदनशील जानकारी जैसे ओटीपी, सेव किए गए पासवर्ड, बैंकिंग क्रेडेंशियल आदि प्राप्त करके काम पर लग जाते हैं.

डाउनलोड न करें स्क्रीन शेयरिंग ऐप

आरबीआई का कहना है, ‘अगर आपके डिवाइस में कोई तकनीकी गड़बड़ी है और आपको कोई स्क्रीन शेयरिंग ऐप डाउनलोड करने की जरूरत है, तो अपने डिवाइस से पेमेंट से जुड़े सभी ऐप को डीएक्टिवेट/लॉग आउट कर दें. ऐसे ऐप तभी डाउनलोड करें जब आपको कंपनी के आधिकारिक टोल-फ्री नंबर के माध्यम से सलाह दी जाए, यदि कंपनी का कोई कर्मचारी अपने व्यक्तिगत संपर्क नंबर के माध्यम से आपसे संपर्क करता है तो ऐसे ऐप डाउनलोड न करें.

UPI फ्रॉड

भारत में सबसे ज्यादा ऑनलाइन लेन-देन UPI के जरिए होता है. ऐसे में स्कैमर्स अशिक्षित और ऑनलाइन पेमेंट की जानकारी कम रखने वाले यूजर्स को अपना शिकार बनाते हैं. UPI यूजर को स्कैमर अक्सर ऐसे मैसेज भेजते हैं, जिसमें उन्हें शानदार डील ऑफर की जाती है. इसके बाद वह थोड़ी बातचीत करते हैं और फिर पूछते हैं कि क्या वे ऑनलाइन पेमेंट करके प्रोडक्ट को बुक कर सकते हैं? इसके बाद यूजर खुशी -खुशी उनको पेमेंट करने लिए राजी हो जाते हैं और स्कैमर्स के जाल में फंस जाते हैं.

क्यूआर कोड से घोटाला

क्यूआर कोड स्कैम ने भारत में अपनी जगह बना ली है क्योंकि अधिकांश लोग अपने स्मार्टफोन से ऑनलाइन पेमेंट करते वक्त क्यूआर कोड का उपयोग करते हैं. आरबीआई ने अपने एक सर्कुलर में कहा है कि ज्यादातर स्कैमर्स ग्राहकों को संपर्क करके उनसे क्यूआर कोड को स्कैन करने के लिए कहते हैं. स्कैमर्स लोगों को उनके फोन पर बैंकिंग एप्लिकेशन का उपयोग करने के लिए आश्वस्त करते हैं और जैसे ही यूजर कोड को स्कैन करते हैं उनके अकाउंट से स्कैमर पैसे चुरा लेते हैं.

सर्च इंजन रिजल्ट में हेरफेर

बहुत से लोग अपने बैंकों, बीमा कंपनियों और व्यापारियों के कॉन्टैक्ट डिटेल प्राप्त करने के लिए सर्ज इंजन का सहारा लेते हैं. आमतौर पर यह बहुत अच्छे से काम करता है, लेकिन कभी-कभी, धोखेबाज SEO जैसी तकनीकों का उपयोग करके वास्तविक वेबसाइट में हेरफेर किए गए क्रेडेंशियल्स को रैंक कर देते हैं जिससे ग्राहक असली बैंक वेबसाइट के बजाय फर्जी वेबसाइट पर पहुंच जाते हैं और वहां नंबर ले लेते हैं.

दुर्भाग्य से ये धोखेबाज अत्यधिक हेरफेर करते हैं और अंत में आपको अपने संवेदनशील डिटेल साझा करने के लिए मना लेते हैं. इसे रोकने के लिए, यह सलाह दी जाती है कि आप फोन नंबर या ईमेल को क्रॉस-चेक करें . इसके अलावा, आरबीआई का कहना है कि सर्च इंजन रिजल्ट पेज सीधे दिखाई देने वाले नंबरों पर कॉल न करें. गौरतलब है कि कस्टमर केयर नंबर कभी भी मोबाइल नंबर के रूप में नहीं होते हैं.

फिशिंग स्कैम

स्कैमर्स संस्थाओं से मिलती-जुलती वेबसाइट बनाकर यूजर्स को बरगला सकते हैं. ऑनलाइन ट्रांजेक्श और ई-कॉमर्स के नए ग्राहक ऐसी वेबसाइटों की पहचान करने और लेनदेन को पूरा करने में विफल हो सकते हैं. मैसेजिंग ऐप और सोशल मीडिया पर ऐसी वेबसाइटों का यूआरएल मिलना आम बात है. इसके अलावा स्कैमर यूजर्स को एसएमएस ब्रॉडकास्ट करने के लिए बल्क मैसेजिंग सेवाओं का भी उपयोग करते हैं.नोट – प्रत्येक फोटो प्रतीकात्मक है (फोटो स्रोत: गूगल) [ डि‍सक्‍लेमर: यह न्‍यूज वेबसाइट से म‍िली जानकार‍ियों के आधार पर बनाई गई है. EkBharat News अपनी तरफ से इसकी पुष्‍ट‍ि नहीं करता है. ]

Rutvisha patel

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