INDIA की आज़ादी में सबसे बड़ा हाथ किसका है?

INDIA की आज़ादी में सबसे बड़ा हाथ किसका है?

(1.A) एडोल्फ हिटलर :

भारत समेत पूरी दुनिया में फैले अंग्रेजी साम्राज्य के पतन को एडोल्फ हिटलर ने सुनिश्चित किया था। यदि आप 1947 से 1950 तक का काल देखें तो ब्रिटेन ने भारत समेत अपने दर्जनों उपनिवेशों से अपने बोरिया बिस्तर बाँधने शुरू कर दिए थे, और यह सिलसिला 1958 तक निरंतर चलता रहा। 6 वर्ष तक चले द्वितीय विश्व युद्ध के कारण ब्रिटेन अपने लाखों सैनिक गँवा चुका था , और आर्थिक रूप से भी बेहद घाटे में था। अत: इतने फैले हुए साम्राज्य को सँभालने के लिए जिस ताकत की जरूरत थी , वह अब बची नहीं थी। तो पहला बड़ा कारण एडोल्फ हिटलर थे , जिन्होंने दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य को अंदर तक तोड़ दिया था। हिटलर एक क्रूर शासक थे लेकिन उनकी क्रूरता भारत के लिए वरदान साबित हुयी। यदि हिटलर ब्रिटेन को युद्ध में नहीं खींचते और इतने लम्बे समय तक उन्हें युद्ध में न उलझा पाते तो शायद भारत आज भी गुलाम होता।

भारत में सिर्फ 1 लाख अंग्रेज थे। किन्तु वे सभी हथियारबंद थे , और सिर्फ इसी वजह से वे 40 करोड़ भारतीयों को 200 वर्षो तक गुलाम बनाकर रख पाए। किन्तु द्वितीय विश्व युद्ध के कारण अंग्रेजो को हिटलर से लड़ने के लिए भारतीय नागरिको को बड़े पैमाने पर हथियार चलाने का प्रशिक्षण देना पड़ा , भारत में हथियार बनाने की फैक्ट्रियां लगानी पड़ी और बड़े पैमाने पर भारतीय युवाओ को सेना में शामिल करना पड़ा। इस तरह एडोल्फ भाई हिटलर ने अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेजो को मजबूर कर दिया था कि वे भारतीयों का सशस्त्रीकरण करें।

(1.B) अहिंसा मूर्ती राष्ट्रपिता महात्मा सुभाष चंद्र बोस :

जापान के हारने के बाद भी महात्मा सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिन्द फ़ौज न सिर्फ लड़ रही थी बल्कि जीत भी रही थी। आजाद हिन्द फ़ौज की सफलता ने भारत के क्रांतिकारियों में यह विश्वास पैदा कर दिया था कि अंग्रेजो को हराया जा सकता है। बाद में जब अंग्रेजो ने हवाई जहाज से बमबारी शुरू की तो आजाद हिन्द फ़ौज हारने लगी थी , लेकिन सुभाष बाबू के गायब होने के बावजूद आजाद हिन्द फ़ौज के काफी सैनिक बच गए थे और भारत में भारतीय सैनिको के साथ मिलकर विद्रोह की योजना बना रहे थे।

(1.C) अहिंसा मूर्ती महात्मा उधम सिंह जी :

उधम सिंह जी ने 1940 में लंदन में गवर्नर माइकल ड्वायर का वध कर दिया था। तब ब्रिटेन में काफी भारतीय रह रहे थे , और अंग्रेजो को अपने ही घर में एक अज्ञात भय सताने लगा था। उन्हें उधम सिंह जी ने यह महसूस कराया कि अब अंग्रेज अधिकारी इंग्लैंड में भी सुरक्षित नहीं रह गए है।

(2) बॉम्बे नौ सेना विद्रोह :

भारतीय युवाओ को बड़े पैमाने पर हथियारों का प्रशिक्षण देना , आजाद हिन्द फ़ौज द्वारा आक्रमण , भारत में हथियारों का उत्पादन और ब्रिटिश सेना की कमजोर स्थिति का परिणाम यह हुआ कि भारत के सैनिक एवं क्रांतिकारियों को यह लगने लगा कि यदि इस समय 1857 की तरह विद्रोह किया जाए तो ब्रिटिश सेना इस संभाल नहीं पाएगी। और इसका साक्ष्य दिसम्बर 1946 के बॉम्बे नौ सेना विद्रोह में देखने को मिला।

नेवी रिवोल्ट बेहद सफल रहा और विद्रोहियों ने बिना किसी विशेष प्रतिरोध के बॉम्बे प्रोविंस का अधिग्रहण कर लिया था। इस विद्रोह को जब अंग्रेज दबा नहीं पाए तो जवाहर लाल एवं मोहन गांधी ने नौ सैनिको से हथियार डालने की अपील की , किन्तु नौ सैनिको ने मोहन की बात मानने से इंकार कर दिया था। अंग्रेज यह समझ चुके थे कि मोहन का जादू उतर चुका है और उनकी चरखा रेजिमेंट अब भारतीय युवाओ के विद्रोह को रोकने में असफल है। यदि भारत के अन्य क्षेत्रो में भी इस तरह के विद्रोह शुरू हो जाते तो अंग्रेज भारत में घिर जाते , और उन्हें भारत छोड़ कर भागने का मौका नहीं मिलता। तब इस बात की सम्भावना ज्यादा थी कि भारत के सभी अंग्रेज होलसेल में क़त्ल कर दिए जाते। तो बाहरी कारणों ने नौ सेना विद्रोह को ट्रिगर किया और बॉम्बे नौसेना विद्रोह वह निर्णायक घटना थी , जिसके बाद अंग्रेज भारत छोड़ने के लिए बेताब हो गए थे।

(1) मोहन गांधी :

मोहन भाई का योगदान नकारात्मक था। लोगो में जागरूकता लाना एक निहायत ही बकवास गतिविधि है , और इसे पेड मिडिया द्वारा गढ़ा गया है। पूरा देश जानता था कि हम अंग्रजो के गुलाम है , और अंग्रेजो ने हमें बल से अपना गुलाम बना रखा है। अंग्रेज भारतीयों के साथ पशुवत व्यवहार करते थे और पूरा देश उनके पंजे से निकलने के लिए छटपटा रहा था। तो यहाँ मोहन भाई किस तरह की जागरूकता लाने की कोशिश कर रहे थे यह बात मेरे आज तक समझ नहीं आयी !! दरअसल मोहन भाई का एक ही उद्देश्य था – जो युवा आजादी की लड़ाई में योगदान देना चाहते थे और यह मानते थे कि अंग्रेजो को खदेड़ने के लिए बल प्रयोग करना पड़ेगा , मोहन भाई उन्हें इकट्ठा कर के यह समझा रहे थे कि उन्हें अंग्रेजो पर हमला करने की जगह उनसे विनती करनी चाहिए और यदि बदले में अंग्रेज उन्हें चांटे मारते है तो सहर्ष खा लेने चाहिए !!

इस तरह मोहन भाई ने लाखों युवाओ को अहिंसा मूर्ती महात्मा भगत सिंह जी एवं अहिंसा मूर्ती महात्मा चंद्र शेखर आजाद के रास्ते पर चलने से रोका और उन्हें भजन गाने , चरखे चलाने ,अनशन करने और आतताइयों से जूते खाने के लिए तैयार किया। इस वजह से आजादी आने विलम्ब हुआ। तो मेरे विचार में मोहन भाई का योगदान नकारात्मक था। ये हमारे पेड इतिहासकारो की जादूगरी है कि उन्होंने मोहन भाई को आजादी की लड़ाई से जोड़ दिया है। जबकि मोहन भाई का आजादी की लड़ाई से कोई लेना देना ही नहीं था। दरअसल वे अंग्रेजो के पाले में थे और उनकी तरफ से लड़ रहे थे।

(2) सरदार पटेल :

आजादी आने के बाद सरदार पटेल ने भारत के एकीकरण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया , और इसके लिए हम उनके ऋणी है। यद्यपि उन्होंने अंग्रेजो के दबाव में आकर एक ऐसा कदम उठाया जिससे आजादी के आन्दोलन को गंभीर क्षति हुयी। उनके भाई विट्ठल भाई पटेल इंग्लैंड में उद्योगपति थे और जब उनका अवसान हुआ तो उन्होंने अपनी सम्पत्ति का वारिस अहिंसा मूर्ती राष्ट्रपिता महात्मा सुभाष चंद्र बोस को बना दिया था। अंग्रेजो ने सरदार पटेल को धमकाया और सरदार पटेल ने इस वसीयत के खिलाफ मुकदमा डाल दिया। इस तरह महात्मा सुभाष चंद्र बोस इस सम्पत्ति से वंचित हो गए। यदि ये सम्पत्ति सुभाष बाबू को मिल जाती तो वे ज्यादा तेजी से और ज्यादा बड़ी सेना खड़ी कर पाते। किन्तु इस एक घटना के अलावा सरदार पटेल ने आजादी की लड़ाई में कोई नकारात्मक योगदान नहीं दिया। तो मेरे विचार में इसे आधार नहीं बनाया जा सकता। मेरे विचार में सरदार पटेल सच्चे राष्ट्रवादी थे किन्तु अंग्रेजो की कड़ी नजर में रहने के कारण उन्हें पर्याप्त मौके नहीं मिले।

(3) आरएसएस :

1947 में संघ के कार्यकर्ताओ की अधिकृत संख्या लगभग 8 लाख थी। ये सभी स्वयंसेवक राष्ट्र भक्ति से ओतप्रोत और अनुशासित थे। किन्तु संघ ने आजादी की लड़ाई से खुद को अलग थलग रखा। इस तरह देश के कार्यकर्ताओं की एक बड़ी फ़ौज निष्क्रिय पड़ी रही। यदि संघ ने इन्हें हथियार चलाने का प्रशिक्षण दे दिया होता तो संघ के कार्यकर्ता आसानी से अंग्रेजो को खदेड़ सकते थे। 1936 में महाराष्ट्र के राजा ने अपनी वसीयत में एक बड़ी राशि संघ को दान दी थी , किन्तु साथ ही यह शर्त भी लगाई थी कि इस राशि का प्रयोग सिर्फ स्वयं सेवको को तीरंदाजी का प्रशिक्षण देने के लिए किया जाए। वसीयत के अनुसार यह राशि उनके छोटे भाई ने हेडगेवार जी को भेज भी दी थी। किन्तु हेडगेवार जी ने स्वयं सेवको को तीरंदाजी का प्रशिक्षण देने से इनकार कर दिया था । इस तरह संघ आजादी की लड़ाई से निरपेक्ष था।

(4) कोंग्रेस :

कोंग्रेस का आम कार्यकर्ता देश के प्रति समर्पित था , लेकिन कोंग्रेस का शीर्ष नेतृत्व निकम्मा एवं बिका हुआ था। जिन कार्यकर्ताओ को यह बात समझ आ जाती थी कि कोंग्रेस टाइम पास कर रही है , वे कोंग्रेस को छोड़ देते थे और अपने तरीके से अंग्रेजो को खदेड़ने के लिए काम करना शुरू करते थे। लेकिन बहुत कम कार्यकर्ता कोंग्रेस की इस नीति को समझ पाए। तो आजादी की लड़ाई में कोंग्रेस के सभी शीर्ष नेताओं का योगदान भी नकारात्मक था। जो कार्यकर्ता कोंग्रेस में बने रहे उनका योगदान न नकारात्मक था और न ही सकारात्मक। किन्तु इसमें उनका दोष नहीं था। क्योंकि वे भ्रम में थे। नोट – प्रत्येक फोटो प्रतीकात्मक है (फोटो स्रोत: गूगल) [ डि‍सक्‍लेमर: यह न्‍यूज वेबसाइट से म‍िली जानकार‍ियों के आधार पर बनाई गई है. EkBharat News अपनी तरफ से इसकी पुष्‍ट‍ि नहीं करता है. ]

Rutvisha patel

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