Cold drinks की बोतल में पानी क्यों नही पीना चाहिए? दवा की शीशी में रूई क्यों रखी जाती?

Cold drinks की बोतल में पानी क्यों नही पीना चाहिए? दवा की शीशी में रूई क्यों रखी जाती?

गर्मी का मौसम शुरू हो गया है और गर्मी के मौसम के साथ ठंडे पानी की भी जरुरत शुरू हो गई है. आपने लोगों को देखा होगा कि लोग फ्रीज में ठंडे पानी की बोतल रखते हैं और कई लोग कोल्ड ड्रिंक की बोतल में ही पानी रखते हैं. हो सकता है कि आपके घर पर फ्रिज में भी ऐसी बोतल हो, जिसमें कोल्ड ड्रिंक आई थी और आपने बाद में पानी के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. अगर आपके घर में भी कोल्ड ड्रिंक की बोतल में पानी रखा है तो आपको संभलने की जरुरत है, क्योंकि ये आपकी हेल्थ के लिए काफी नुकसानदायक हो सकता है.

जी हां, मिनरल वॉटर या कोल्ड ड्रिंक की बोतल एक टाइम यूज करने के लिए होती है. एक बार इस्तेमाल करने के बाद इसे क्रश करके फेंक देना चाहिए. दरअसल, इस बोतल का लंबे समय तक इस्तेमाल करना आपने लिए काफी नुकसानदायक हो सकता है. ऐसे में जानते हैं कि आपके लिए कोल्ड ड्रिंक की बोतल का इस्तेमाल करना कितना नुकसानदायक है और इसके क्या क्या नुकसान हैं. जानते हैं प्लास्टिक बोतल से जुड़े नुकसान…

क्या आप भी कोल्ड ड्रिंक की बोतल में फ्रीज में पानी रखते हैं? तो ये खबर जरूर पढ़ें

पैदा हो जाते हैं कई नुकसानदायक तत्व

ये तो आप सब जानते हैं कि प्लास्टिक में कई हानिकारक तत्व होते हैं. लेकिन, क्या आप जानते हैं जब आप प्लास्टिक की बोतल में पानी रखते हैं तो इसमें fluoride और arsenic जैसे कई तत्व पैदा हो जाते हैं, इंसान के शरीर के लिए स्लो पॉइजन का काम करते हैं. की एक रिपोर्ट के अनुसार, प्लास्टिक की बोतल में रखा गया पीने वाला पानी धीरे-धीरे आपके शरीर को नुकसान पहुंचाता है.

होता है डायऑक्सिन का प्रोडक्शन

जब भी गर्मी होती है तो प्लास्टिक पिघलने लगता है. आपने देखा होगा कि जब प्लास्टिक की बोतल में गर्म पानी डालते हैं तो उनकी शेप चेंज हो जाती है. ऐसे में जब आप घर में प्लास्टिक बोतल में पानी रखते हैं तो उसे ही कार में रख लेते हैं. कार में रखी बोतल सूर्य की रोशनी से गर्म होती है और टोक्सिन यानी डायॉक्सिन पैदा होने लगते हैं, इससे ब्रेस्ट कैंसर की भी खतरा होता है.

बीपीए भी करता है नुकसान

बीपीए का मतलब है Biphenyl A. यह एक तरह का केमिकल होता है जो आपके शरीर के लिए काफी नुकसानदायक है. इसकी वजह से ही डायबिटीज, मोटापा, फर्टिलिटी प्रॉब्लम्स आदि की दिक्कत होती है. इसका कारण है प्लास्टिक की बोतल में पानी रखना, इसलिए कोशिश करें कि प्लास्टिक की बोतल में पानी ना रखें.

इम्यून सिस्टम पर भी डालती है असर

कई रिपोर्ट में सामने आया है कि प्लास्टिक की बोतल में रखे पानी से आपके इम्यून सिस्टम पर बी काफी असर पड़ता है. इससे पैदा होने वाले कैमिकल आपके शरीर पर गहरा असर डालते हैं. प्लास्टिक में फैथलेट्स जैसे केमिकल की मौजूदगी की वजह से लिवर कैंसर का खतरा भी बढ़ जाता है.

अक्‍सर देखा होगा जिन ट्रांसपेरेंट शीशियों में दवा की टेबलेट्स (Tablets) रखकर मरीजों को दी जाती हैं उसमें ढक्‍कन लगाने से पहले रूई (Cotton) रखी जाती है. कभी सोचा है कि ऐसा क्‍यों होता है. ऐसा खासकर होम्‍योपैथ‍िक दवाओं (Homeopathic medicines) के मामले में अध‍िक देखा जाता है. डॉक्‍टर शीशी में दवा डालने के बाद उसमें कुछ रूई डालते हैं. इसके बाद ही ढक्‍कन बंद करते हैं. जानिए ऐसा क्‍यों होता है.

रीडर डाइजेस्‍ट की रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसा करने की शुरुआत 1900 में हुई. कहा जाता है, सबसे पहले फार्मा  कंपनी बायर ने ऐसा किया. कंपनी दवा की जिन शीशियों की डि‍लीवरी करती थी उसमें रूई को गेंद जैसा आकार बनाकर शीशी में रखते थे. दवा की बड़ी कंपनी होने के कारण इस ट्रेंड को दूसरी कंपनियों ने भी फॉलो किया.

रीडर डाइजेस्‍ट की रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसा करने की शुरुआत 1900 में हुई. कहा जाता है, सबसे पहले फार्मा कंपनी बायर ने ऐसा किया. कंपनी दवा की जिन शीशियों की डि‍लीवरी करती थी उसमें रूई को गेंद जैसा आकार बनाकर शीशी में रखते थे. दवा की बड़ी कंपनी होने के कारण इस ट्रेंड को दूसरी कंपनियों ने भी फॉलो किया.

कंपनी ने ऐसा क्‍यों किया, इसकी भी एक खास वजह थी. कंपनी का मानना है कि अगर दवाओं से भरी शीशी में रूई लगाई जाती है तो इनके टूटने की आशंका कम हो जाएगी. इसके अलावा डोज की मात्रा घटेगी नहीं. यह समान मात्रा में बनी रहेगी. अगर कोई कस्‍टमर शीशी को खोलता है तो उसे परेशान नहीं होना पड़ेगा. इसलिए ऐसा किया गया.

लम्‍बे समय से मरीजों को ऐसा देखते हुए दवा की खास देखभाल करने की आदत सी हो गई थी. इसलिए मरीज खुद से भी यही काम करने लगे थे. यही कारण था कि कई कंपनियों ने शीशी में रूई रखने का चलन फिर से शुरू किया, जो खासतौर पर होम्‍योपैथ‍िक दवाओं के मामले में आज भी जारी है.

यह चलन शुरू होने के बाद 1980 में बड़ा बदलाव आया जब टेबलेट के बाहरी हिस्‍से में ऐसी लेयर बनाई जाने लगी जिससे इन्‍हें शीशी में रखने पर ये टूटे नहीं. दुनिया की कई बड़ी कंपनियों ने 1999 में ऐसा करना बंद कर दिया. हालांकि स्‍थानीय स्‍तर पर फार्मेसी ने ऐसी होम्‍योपैथ‍िक दवाएं जिनमें अल्‍कोहल का प्रयोग नहीं किया जाता, उनके लिए रूई का प्रयोग करना जारी रखा.

लम्‍बे समय से मरीजों को ऐसा देखते हुए दवा की खास देखभाल करने की आदत सी हो गई थी. इसलिए मरीज खुद से भी यही काम करने लगे थे. यही कारण था कि कई कंपनियों ने शीशी में रूई रखने का चलन फिर से शुरू किया, जो खासतौर पर होम्‍योपैथ‍िक दवाओं के मामले में आज भी जारी है. नोट – प्रत्येक फोटो प्रतीकात्मक है (फोटो स्रोत: गूगल) [ डि‍सक्‍लेमर: यह न्‍यूज वेबसाइट से म‍िली जानकार‍ियों के आधार पर बनाई गई है. EkBharat News अपनी तरफ से इसकी पुष्‍ट‍ि नहीं करता है. ]

Rutvisha patel

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