भारत दुनिया से कचरा क्यों खरीद रहा है ? | देखिए video

भारत दुनिया से कचरा क्यों खरीद रहा है ? | देखिए video

दशकों पहले लोगों की सुविधा के लिये प्लास्टिक का आविष्कार किया गया लेकिन धीरे-धीरे यह अब पर्यावरण के लिये ही नासूर बन गया है। प्लास्टिक और पॉलीथीन के कारण पृथ्वी और जल के साथ-साथ वायु भी प्रदूषित होती जा रही है। हाल के दिनों में मीठे और खारे दोनों प्रकार के पानी में मौजूद जलीय जीवों में प्लास्टिक के केमिकल से होने वाले दुष्प्रभाव नजर आने लगे हैं। इसके बावजूद प्लास्टिक और पॉलीथीन की बिक्री में कोई कमी नहीं आई है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर प्लास्टिक और उससे बनने वाले कचरे के नुकसान के बारे में देशवासियों को बताया। उन्होंने सिंगल टाइम यूज प्लास्टिक (एक बार उपयोग किया जाने वाला) का उपयोग बंद करने की बात कही। लेकिन क्या आप यह जानते हैं कि हमारे देश में कितना प्लास्टिक कचरा निकलता है। देश-दुनिया में प्लास्टिक की क्या स्थिति है। प्लास्टिक का कितना कचरा जमा है और कितना खपाया जा चुका है।

पिछले 50 वर्ष में हमने अगर किसी चीज का सबसे ज्यादा उपयोग किया है तो वो है प्लास्टिक। इतना ज्यादा उपयोग किसी भी अन्य वस्तु का नहीं किया गया है। 1960 में दुनिया में 50 लाख टन प्लास्टिक बनाया जा रहा था। आज यह मात्रा बढ़कर 300 करोड़ टन के पार हो चुकी है। यानी लगभग हर व्यक्ति के लिए करीब आधा किलो प्लास्टिक हर वर्ष बन रहा है।वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में सालाना 56 लाख टन प्लास्टिक का कूड़ा बनता है। दुनियाभर में जितना कूड़ा हर साल समुद्र में बहा दिया जाता है उसका 60 प्रतिशत हिस्सा भारत डालता है। प्रत्येक भारतीय रोजाना 15000 टन प्लास्टिक को कचरे के रूप में फेंक देते हैं। प्लास्टिक प्रदूषण के कारण पानी में रहने वाले करोड़ों जीव-जंतुओं की मौत हो जाती है।

यह धरती के लिए काफी हानिकारक है। दुनियाभर के विशेषज्ञ कहते हैं कि जिस रफ्तार से हम प्लास्टिक इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे वर्ष 2020 तक दुनियाभर में 12 अरब टन प्लास्टिक कचरा जमा हो चुका होगा। इसे साफ करने में सैकड़ों साल लग जाएंगे।

विदेश से भी आता है प्लास्टिक का कचरा

दुनिया के 25 से ज्यादा देश अपना 1,21,000 मीट्रिक टन कचरा किसी न किसी रूप में भारत भेज देते हैं। इस प्लास्टिक को रीसाइकिल करने के बाद भारत भेजा जाता है। पर्यावरणविदों और विशेषज्ञों का कहना है कि अब समय आ गया है कि सरकार को प्लास्टिक प्रदूषण फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कदम उठाना चाहिए। हमारे देश में 55,000 मीट्रिक टन प्लास्टिक का कचरा पाकिस्तान और बांग्लादेश से आयात किया जाता है। इसे आयात करने का मकसद रीसाइक्लिंग करना है। इन दोनों देशों के अलावा मिडिल ईस्ट, यूरोप और अमेरिका से भी इस प्रकार का कचरा आता है।

प्लास्टिक की शुरुआत

भारत में प्लास्टिक का प्रवेश 60 के दशक में हुआ था। आज इसको लेकर अजीब-सा विवाद बना हुआ है। पर्यावरणविदों का कहना है कि यह पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरनाक है लेकिन इसके पक्षधरों का दावा है कि यह ‘इको फ्रेंडली’ यानी पारिस्थितिकी संगत है क्योंकि यह लकड़ी और कागज का उत्तम विकल्प है। वास्तव में देखा जाए तो प्लास्टिक अपने उत्पादन से लेकर इस्तेमाल तक सभी अवस्थाओं में पर्यावरण और समूचे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरनाक है। क्योंकि इसका निर्माण पेट्रोलियम से प्राप्त रसायनों से होता है। इसलिए पर्यावरणविदों का मानना है कि प्लास्टिक से निकली हुई जहरीली गैस स्वास्थ्य के लिए एक अन्य खतरा है। इसके उत्पादन के दौरान व्यर्थ पदार्थ निकलकर जल स्रोतों में मिलकर जल प्रदूषण का कारण बनते हैं। इसके अलावा गौरतलब तथ्य यह भी है कि इसका उत्पादन ज्यादातर लघु उद्योग क्षेत्र में होता है जहां गुणवत्ता नियमों का पालन नहीं हो पाता।

स्टिक प्रदूषण के बारे में यह जानिए

  • प्लास्टिक की उत्पत्ति सेलूलोज डेरिवेटिव में हुई थी। प्रथम सिंथेटिक प्लास्टिक को बेकेलाइट कहा गया और इसे जीवाश्म ईंधन से निकाला गया था।
  • फेंकी हुई प्लास्टिक धीरे-धीरे अपघटित होती है एवं इसके रसायन आसपास के परिवेश में घुलने लगते हैं। यह समय के साथ और छोटे-छोटे घटकों में टूटती जाती है और हमारी खाद्य श्रृंखला में प्रवेश करती है।
  • यहां यह स्पष्ट करना बहुत आवश्यक है कि प्लास्टिक की बोतलें ही केवल समस्या नहीं हैं, बल्कि प्लास्टिक के कुछ छोटे रूप भी हैं, जिन्हें माइक्रोबिड्स कहा जाता है। ये बेहद खतरनाक तत्त्व होते हैं। इनका आकार 5 मिलीमीटर से अधिक नहीं होता है।
  • इनका इस्तेमाल सौंदर्य उत्पादों तथा अन्य क्षेत्रों में किया जाता है। ये खतरनाक रसायनों को अवशोषित करते हैं। जब पक्षी एवं मछलियां इनका सेवन करती हैं तो यह उनके शरीर में चले जाते हैं।
  • भारतीय मानक ब्यूरो ने हाल ही में जैव रूप से अपघटित न होने वाले माइक्रोबिड्स को उपभोक्ता उत्पादों में उपयोग के लिये असुरक्षित बताया है।
  • अधिकांशतः प्लास्टिक का जैविक क्षरण नहीं होता है। यही कारण है कि वर्तमान में उत्पन्न किया गया प्लास्टिक कचरा सैकड़ों-हजारों साल तक पर्यावरण में मौजूद रहेगा। ऐसे में इसके उत्पादन और निस्तारण के विषय में गंभीरतापूर्वक विचार-विमर्श किए जाने की आवश्यकता है।

वर्तमान स्थिति की बात करें तो

  • स्थिति यह है कि वर्तमान समय में प्रत्येक वर्ष तकरीबन 15 हजार टन प्लास्टिक का उपयोग किया जा रहा है। प्रतिवर्ष हम इतनी अधिक मात्रा में एक ऐसा पदार्थ इकठ्ठा कर रहे हैं जिसके निस्तारण का हमारे पास कोई विकल्प मौजूद नहीं है।
  • यही कारण है कि आज के समय में जहां देखो प्लास्टिक एवं इससे निर्मित पदार्थों का ढेर देखने को मिल जाता है।
  • पहले तो यह ढेर धरती तक ही सीमित था लेकिन अब यह नदियों से लेकर समुद्र तक हर जगह नजर आने लगा है। धरती पर रहने वाले जीव-जंतुओं से लेकर समुद्री जीव भी हर दिन प्लास्टिक निगलने को विवश है।
  • इसके कारण प्रत्येक वर्ष तकरीबन एक लाख से अधिक जलीय जीवों की मृत्यु होती है।
  • समुद्र के प्रति मील वर्ग में लगभग 46 हजार प्लास्टिक के टुकड़े पाए जाते हैं।
  • इतना ही नहीं हर साल प्लास्टिक बैग का निर्माण करने में लगभग 4.3 अरब गैलन कच्चे तेल का इस्तेमाल होता है।

प्लास्टिक निर्माण की दर

  • वैश्विक स्तर पर पिछले सात दशकों में प्लास्टिक के उत्पादन में कई गुणा बढ़ोतरी हुई है। इस दौरान तकरीबन 8.3 अरब मीट्रिक टन प्लास्टिक का उत्पादन किया गया।
  • इसमें से लगभग 6.3 अरब टन प्लास्टिक कचरे का ढेर बन चुका है, यह और बात है कि इसमें से केवल 9 फीसदी हिस्से को ही अभी तक रिसाइकिल किया जा सका है।
  • यदि भारत के संदर्भ में बात करें तो यहां हर साल तकरीबन 56 लाख टन प्लास्टिक कचरे का उत्पादन होता है। जिसमें से लगभग 9205 टन प्लास्टिक को रिसाइकिल किया जाता है।
  • केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, देश के चार महानगरों यथा- दिल्ली में रोजाना 690 टन, चेन्नई में 429 टन, कोलकाता में 426 टन और मुंबई में 408 टन प्लास्टिक कचरा फेंका जाता है।
  • ‘द गार्जियन’ में हाल में छपे एक लेख के मुताबिक, दुनिया भर में प्रत्येक मिनट लाखों प्लास्टिक की बोतलें खरीदी जाती हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) 2014 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हर साल उपभोक्ता वस्तुओं के क्षेत्र में प्लास्टिक उपयोग की कुल प्राकृतिक पूंजी लागत 75 अरब डॉलर है। यह बढ़ते उपभोक्तावाद और प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग के साथ और बढ़ेगा।

जलीय जीवों को क्षति

वैज्ञानिक अब तक 250 जीवों के पेट में खाना समझकर या अनजाने में प्लास्टिक खाने की पु्ष्टि कर चुके हैं। इनमें प्लास्टिक बैग, प्लास्टिक के टुकड़े, बोतलों के ढक्कन, खिलौने, सिगरेट लाइटर तक शामिल हैं। समुद्र में जेलीफिश समझकर प्लास्टिक बैग खाने वाले जीव हैं, तो हमारे देश में सड़कों पर आवारा छोड़ दी गई गायें इन प्लास्टिक के बैग में छोड़े गए खाद्य पदार्थों के साथ बैग भी खा जाती हैं।

साथ ही 693 प्रजातियों के जलीय, पक्षी और वन्य जीव अब तक प्लास्टिक के जाल रस्सियों और अन्य वस्तुओं में उलझे मिले हैं, जो अक्सर उनकी मौत की वजह बनते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ पर्यावरण कार्यक्रम की रिपोर्ट के अनुसार प्लास्टिक से बचाव में हो रहा निवेश विभिन्न देशों को आर्थिक रूप से भी नुकसान पहुंचा रहा है। अमेरिका अकेले 1300 करोड़ डॉलर अपने समुद्र तटों से प्लास्टिक साफ करने में खर्च कर रहा है।

सबसे ज्यादा आयात कहां

प्लास्टिक आयात के मामले में पूरे देश में दिल्ली सबसे ऊपर है। दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश है। इन दोनों ही राज्यों में प्लास्टिक को रीसाइकिल करने का व्यवसाय किया जाता है और इसी वजह से यहां के व्यापारी इसे आयात करते हैं।

सराहनीय उपाय

दुनिया के कई हिस्सों में अनुपयोगी प्लास्टिक कचरे से सड़कें बनाई जा रही हैं। वहीं ईरान सहित कई देश प्लास्टिक को छोटे टुकड़ों में तोड़कर उन्हें कंक्रीट के रूप में पत्थरों की कमी दूर करने के लिए उपयोग कर रहे हैं। वहीं प्लास्टिक के रीसाइकल की बात की जाए तो इस समय दुनिया का एक तिहाई प्लास्टिक ही रीसाइकिल हो पा रहा है।वैज्ञनिकों के अनुसार, प्लास्टिक को अधिक से अधिक मात्रा में रीसाइकिल करने की जरूरत है। इसी तरह मुंबई का वर्सोवा तट, लोगों द्वारा प्लास्टिक से मुक्त करने के अभियान का एक अनूठा उदाहरण बना है। ऐसे ही अभियान देश के विभिन्न हिस्सों में चलाए जा रहे हैं।

देश की कई बड़ी कंपनियों ने प्लास्टिक प्रदूषण में कमी लाने में मदद करने की शपथ ली है। री-यूज, री-साइकिल, रिड्यूज, इन तीन तरीकों को अपनाकर प्लास्टिक प्रदूषण में भारी कमी लाई जा सकती है। भारत सरकार ने कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में प्लास्टिक प्रदूषण रोकने के लिए प्लास्टिक केरी बैग्स पर पूरी तरह पहले से ही रोक लगा रखी है।केरल में कई सरकारी कार्यालय के कर्मचारियों ने प्लास्टिक के बने सामान जैसे प्लास्टिक की पानी की बोतलें और चाय के डिस्पोजेबल कप का उपयोग करना छोड़ दिया है। इसकी जगह स्टील कटलरी का उपयोग करना शुरू कर दिया है। वहीं केरल के मछुआरे महासागरों में फेंकी गई प्लास्टिक को अपने जाल की मदद से बाहर निकाल रहे हैं। उन्होंने कडलममा में समुद्र-में फेंके गए सभी प्लास्टिक के थैले, बोतलें, पुआल इत्यादि को बाहर निकालकर संशोधित करने के लिए पहली बार रीसाइक्लिंग सेंटर स्थापित किया है।

सिक्किम सरकार ने 2016 में दो बड़े फैसले किए। पहले फैसले में उन्होंने सरकारी कार्यालयों को परिसर में पैकिंग पेयजल के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया। दूसरा फैसला,प्लास्टिक प्रदूषण के हानिकारक प्रभाव को कम करने और थर्माकॉल डिस्पोजेबल प्लेट्स और कटलरी की खपत पर प्रतिबंध लगा दिया गया। नोट – प्रत्येक फोटो प्रतीकात्मक है (फोटो स्रोत: गूगल) [ डि‍सक्‍लेमर: यह न्‍यूज वेबसाइट से म‍िली जानकार‍ियों के आधार पर बनाई गई है. EkBharat News अपनी तरफ से इसकी पुष्‍ट‍ि नहीं करता है. ]

Rutvisha patel

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